मुद्दतें हो गई हैं चुप रहते – ‘महशर’ काज़िम हुसैन लखनवी
मुद्दतें हो गई हैं चुप रहते
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते
અર્થ સ્પષ્ટ છે.
जल गया ख़ुश्क हो के दामन-ए-दिल
अश्क आँखों से और क्या बहते
સૂક્કોભઠ્ઠ થઈને દિલના પાલવ/છેડો બળી ગયો….આંખોમાંથી વધુ તો કેટલા આંસુ વહેતે…. [ વક્રોક્તિ છે ]
बात की और मुँह को आया जिगर
इस से बेहतर यही था चुप रहते
વાત કરી તો આખું હૈયું જ હોઠે આવી ગયું….એથી બહેતર તો એ જ હતું કે મૂંગા મરતે…..
हम को जल्दी ने मौत की मारा
और जीते तो और ग़म सहते
દુનિયા છોડવાની ઉતાવળે અમને ઉપર મોકલી જ આપ્યા…. ભલું થયું, જો વધુ જીવતે તો વધુ ઝૂરતે…..
सब ही सुनते तुम्हारी ऐ ‘महशर’
कोई कहने की बात अगर कहते
સાંભળવાલાયક કશું બોલતે તો સહુ તારી વાત સાંભળતે !!
– ‘महशर’ काज़िम हुसैन लखनवी
જીવવું એટલે ઝૂરવું…..ઝૂરવું એટલે જીવવું…..
જનાબ ગુલામઅલી સાહેબ
pragnajuvyas said,
June 20, 2022 @ 8:47 PM
मुद्दतें हो गई हैं चुप रहते
‘महशर’ काज़िम हुसैन लखनव साहब
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते
वाह…
हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के
जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं
—-
सब ही सुनते तुम्हारी ऐ ‘महशर’
कोई कहने की बात अगर कहते
बहुत खुब
ज़ाया ना कर अपने अल्फ़ाज़ हर किसी के लिये….
बस ख़ामोश रह कर देख तुझे समझता कौन है….
प्रेम सदा से चुप है। अहंकार खूब ढोल बजाता है, डुंडी पीटता है, बड़ा शोरगुल करता है। अब तो सिर्फ उन थोड़े से लोगों की जरूरत है, जो तैयार हैं उस आग से गुजरने को जिसमें अहंकार जल जाता है और प्रेम का कमल खिलता है। धन्यवाद तीर्थेशजी ।