જઈને વતનમાં એટલું જોયું અમે 'મરીઝ',
મોટા બની ગયા છે બધા બાળપણના દોસ્ત.
મરીઝ

(माफ करना) – ડૉ. નીરજ મહેતા

तू कहाँ है मेरी जानिब ? माफ करना
तू नहीं दिखता है साहिब, माफ करना

अनसुनी कर दी खला की सब सदायें
क्या पता किस से मुखातिब ? माफ करना

बेसबब ही आप पढलें इस ग़ज़ल को
ये नहीं लगता मुनासिब, माफ करना

साफ दिल से एक धेला कम न लूंगा
है हमारा दाम वाजिब, माफ करना

लोग ‘नीरज’ नाम से पहचानते हैं
मैं नहीं हूँ मीर-ग़ालिब, माफ करना

– डॉ. नीरज मेहता

‘ફોર-અ-ચેઇન્જ’ આજે એક ગુજરાતી કવિની એક ઉર્દૂ ગઝલ. માફ કરના જેવી રદીફને પાંચ શેરોમાં કવિએ જે રીતે બહેલાવી છે એ કાબિલે-દાદ છે. કોઈ એક શેર પસંદ કરવો હોય તો તકલીફમાં મૂકી દે એવું સંઘેડાઉતાર કામ આ મૂળ અમરેલીના પણ હાલ રાજકોટમાં વસતા ડોક્ટરસાહેબે કર્યું છે. आज गुजराती ग़ज़ल को छोडकर मैं, उर्दू से हुआ मुक़ारिब, माफ करना ।

(खला = અવકાશ, ખાલી જગ્યા; मुख़ातिब = વાત કરનાર; बेसबब = અકારણ; धेला = અધેલો; અર્ધો પૈસો, मुक़ारिब = સમીપે, નજીક)

17 Comments »

  1. Kirtikant Purohit said,

    August 9, 2009 @ 1:16 am

    बेसबब ही आप पढलें इस ग़ज़ल को
    ये नहीं लगता मुनासिब, माफ करना

    વાહ ડૉકટર સાહેબ.

  2. pragnaju said,

    August 9, 2009 @ 5:23 am

    तू कहाँ है मेरी जानिब ? माफ करना
    तू नहीं दिखता है साहिब, माफ करना

    વાહ્

    सच्चे मन से की गयी क्षमा याचना को प्रभु माफ कर देते है।
    इसलिए प्रायश्चित करने में विलंब नहीं करना चाहिए।
    सत्य मार्ग पर चलने वाले मनुष्य की प्रभु
    यीशु हर समय सहायता करते हैं।

  3. mrunalini said,

    August 9, 2009 @ 5:33 am

    बेसबब ही आप पढलें इस ग़ज़ल को
    ये नहीं लगता मुनासिब, माफ करना

    दिल में जिगा का जो मुकदमा था।
    आज फ़िर उसकी रूबकारी है।

    फ़िर उसी बेवफा पे मरते हैं।
    फ़िर वही जिंदगी हमारी है।

    फ़िर दिया पारा-ऐ-दिल ने सवाल।
    एक फरियाद आहोजारी है।

    फ़िर हुए गवाह इश्क तलब।
    अश्क बारी का हुकुम जारी है।

    बेखुदी बेसबब नहीं गालिब।
    कुछ तो है जिसकी पर्दागारी है।

  4. કુણાલ said,

    August 9, 2009 @ 6:07 am

    બહોત ખુબ .. !!

    साफ दिल से एक ढेला कम न लूंगा
    है हमारा दाम वाजिब, माफ करना

    આ શેર ખાસ ગમ્યો …

  5. Dr. Neetu Patel said,

    August 9, 2009 @ 7:00 am

    અરે વાહ ડોક્ટર સાહેબ વાહ…
    બહોત ખુબ..

  6. ડૉ.મહેશ રાવલ said,

    August 9, 2009 @ 1:26 pm

    પ્રયત્ન સારો કહી શકાય…..ચૅન્જ ખાતર માણીએ……!

  7. sudhir patel said,

    August 9, 2009 @ 6:03 pm

    સરસ હિન્દી ગઝલ માણવાની મજા આવી.
    સુધીર પટેલ.

  8. Pinki said,

    August 10, 2009 @ 12:26 am

    very nice….!!

    बेसबब ही आप पढलें इस ग़ज़ल को
    ये नहीं लगता मुनासिब, माफ करना !! It can not be, as it’s too good !!

    enjoyed lot ….. and the most fascinating part is

    not even a single sher shows, it’s by a gujju kavi

    otherwise , mostly gujarati leaves her smell.

  9. amit narodiya said,

    August 11, 2009 @ 1:24 am

    Hey

    Niraj, Outstanding …………..Supereb wordings ……
    Relly touches my vibes.

    Best Regards,
    Amit

  10. chandresh shah said,

    August 11, 2009 @ 1:47 am

    Very wonderful Urdu Gazal by Gujarati poet. enjoyed very much. Age badhiye.

  11. AJAY OZA said,

    August 11, 2009 @ 3:53 am

    Laystro ni rajuaat ane star khub saras chhe. aakhi team ne abhinandan.
    …AJAY OZA
    Bhavnagar
    cell : +91 98 25 25 28 11

  12. kedar said,

    August 11, 2009 @ 4:25 am

    vaah niraj…. khub khub saras….
    bahu majaa avi…
    aa ghazal ma mara favourite shaer lakhva ma aakhi ghazal j repet thai jashe…
    🙂

  13. ધવલ said,

    August 11, 2009 @ 8:13 am

    સરસ !

  14. DR.MANOJ L. JOSHI ( JAMNAGAR ) said,

    August 11, 2009 @ 12:29 pm

    vaah…nirajbhai…vaah…’shahid-e-gazal’ maa pan vaachi hti…VIVEKBHAI ni BAAJ-NAJAR ne pan salaam…

  15. Shefali said,

    August 12, 2009 @ 10:10 am

    FUN!!!!

  16. Dr.m.m.dave. said,

    September 21, 2011 @ 2:13 pm

    વાહ નિરજભાઇ, ખરેખર ઉર્દુ શબ્દો નો ખુબ સરસ પ્રયોગ કર્યો છે..અભીનંદન, …લખતા રહો.

  17. dr.ketan karia said,

    October 1, 2011 @ 8:50 am

    साफ दिल से एक धेला कम न लूंगा
    है हमारा दाम वाजिब, माफ करना

    વાહ!!!!

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