એ જે અફવા હતી કથા છે હવે,
આવ, જોવા સમી દશા છે હવે.
રશીદ મીર

मधुशाला : ०३ : मकान की ऊपरी मंज़िल पर – गुलज़ार

मकान की ऊपरी मंज़िल पर अब कोई नहीं रहता

वो कमरे बंद हैं कबसे
जो 24 सीढियां जो उन तक पहुँचती थी, अब ऊपर नहीं जाती

मकान की ऊपरी मंज़िल पर अब कोई नहीं रहता
वहाँ कमरों में, इतना याद है मुझको
खिलौने एक पुरानी टोकरी में भर के रखे थे
बहुत से तो उठाने, फेंकने, रखने में चूरा हो गए

वहाँ एक बालकनी भी थी, जहां एक बेंत का झूला लटकता था.
मेरा एक दोस्त था, तोता, वो रोज़ आता था
उसको एक हरी मिर्ची खिलाता था

उसी के सामने एक छत थी, जहाँ पर
एक मोर बैठा आसमां पर रात भर
मीठे सितारे चुगता रहता था

मेरे बच्चों ने वो देखा नहीं,
वो नीचे की मंजिल पे रहते हैं
जहाँ पर पियानो रखा है, पुराने पारसी स्टाइल का
फ्रेज़र से ख़रीदा था, मगर कुछ बेसुरी आवाजें करता है
के उसकी रीड्स सारी हिल गयी हैं, सुरों के ऊपर दूसरे सुर चढ़ गए हैं

उसी मंज़िल पे एक पुश्तैनी बैठक थी
जहाँ पुरखों की तसवीरें लटकती थी
मैं सीधा करता रहता था, हवा फिर टेढा कर जाती

बहू को मूछों वाले सारे पुरखे क्लीशे [Cliche] लगते थे
मेरे बच्चों ने आखिर उनको कीलों से उतारा, पुराने न्यूज़ पेपर में
उन्हें महफूज़ कर के रख दिया था
मेरा भांजा ले जाता है फिल्मो में
कभी सेट पर लगाता है, किराया मिलता है उनसे

मेरी मंज़िल पे मेरे सामने
मेहमानखाना है, मेरे पोते कभी
अमरीका से आये तो रुकते हैं
अलग साइज़ में आते हैं वो जितनी बार आते
हैं, ख़ुदा जाने वही आते हैं या
हर बार कोई दूसरा आता है

वो एक कमरा जो पीछे की तरफ बंद
है, जहाँ बत्ती नहीं जलती, वहाँ एक
रोज़री रखी है, वो उससे महकता है,
वहां वो दाई रहती थी कि जिसने
तीनों बच्चों को बड़ा करने में
अपनी उम्र दे दी थी, मरी तो मैंने
दफनाया नहीं, महफूज़ करके रख दिया उसको.

और उसके बाद एक दो सीढिया हैं,
नीचे तहखाने में जाती हैं,
जहाँ ख़ामोशी रोशन है, सुकून
सोया हुआ है, बस इतनी सी पहलू में
जगह रख कर, के जब मैं सीढियों
से नीचे आऊँ तो उसी के पहलू
में बाज़ू पे सर रख कर सो जाऊँ

मकान की ऊपरी मंज़िल पर कोई नहीं रहता…

– गुलज़ार

કવિતામાં વાત છે જૂના મકાનની. મકાન કે જેનો વખત વહી ગયો છે. પણ એની સાથે મકાનમાલિકની પણ વાત છે. મકાન અને એના માલિક બન્નેની કથા એક બીજા સાથે ગૂંથાઈ ગયેલી છે. કવિ મકાનના એક પછી એક ભાગમાં તમને લઈ જાય છે અને પોતાના દિલનો એક પછી એક ખૂણો તમને બતાવતા જાય છે. નાજુક યાદગીરીઓ અને બદલાતા સમય સાથે ખોવાઈ ગયેલી લાગણીઓનું આ કવિતામાં બારીક નકશીકામ છે.

3 Comments »

  1. jAYANT SHAH said,

    December 7, 2015 @ 9:29 am

    અર્થ સમજો, તો અદભૂત ! બહુ સ રસ !!!!!!!!

  2. Harshad said,

    December 7, 2015 @ 3:03 pm

    ખૂબ જ સુન્દર . વાહ ગુલઝાર સાહેબ વાહ.

  3. Poonam said,

    December 16, 2015 @ 3:55 am

    The – गुलज़ार….
    Naam hi Kafi he…

RSS feed for comments on this post · TrackBack URI

Leave a Comment