ધનને માટે એક વંશજ કાફી છે
ભાષા માટે લાખ વારસ જોઈએ
– રઈશ મનીઆર

डरता है – राजेश रेड्डी

यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है
खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है

मिरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा
बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है

न बस में ज़िंदगी उस के न क़ाबू मौत पर उस का
मगर इंसान फिर भी कब ख़ुदा होने से डरता है

अजब ये ज़िंदगी की क़ैद है दुनिया का हर इंसाँ
रिहाई माँगता है और रिहा होने से डरता है

– राजेश रेड्डी

આમ તો આખી ગઝલ સરસ છે પણ મક્તાને લીધે આખી ગઝલની ઊંચાઈ બદલાઈ જાય છે…..

2 Comments »

  1. vimala said,

    September 5, 2018 @ 3:17 pm

    सुंदर गज़ल ..

  2. Harshad said,

    September 7, 2018 @ 11:24 am

    RIP !! Bhagvatibhai. You are in good hands with comfort and peace!
    We will miss you always.

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