હાંસિયામાં મૂકવા છે ઘાવને;
ચાલ, તું પાનું બીજું ઉથલાવ ને!
હર્ષા દવે

ग़ज़ल – राजेश रेड्डी

यूँ देखिये तो आंधी में बस इक शजर गया                   [ शजर = वृक्ष ]
लेकिन न जाने कितने परिन्दों का घर गया

जैसे ग़लत पते पे चला आए कोई शख़्स
सुख ऐसे मेरे दर पे रुका और गुज़र गया

मैं ही सबब था अबके भी अपनी शिकस्त का
इल्ज़ाम अबकी बार भी क़िस्मत के सर गया

अर्से से दिल ने की नहीं सच बोलने की ज़िद
हैरान हूँ मैं कैसे ये बच्चा सुधर गया

उनसे सुहानी शाम का चर्चा न कीजिए
जिनके सरों पे धूप का मौसम ठहर गया

जीने की कोशिशों के नतीज़े में बारहा                        [ બારહા = વારંવાર ]
महसूस ये हुआ कि मैं कुछ और मर गया

– राजेश रेड्डी

હમણાં જ કવિના સ્વમુખે આ ગઝલ સાંભળવાનો લ્હાવો મળ્યો. એક એક શેર નાયબ મોતી છે !!

6 Comments »

  1. Rina said,

    January 13, 2015 @ 4:13 am

    Awesome

  2. કુણાલ said,

    January 13, 2015 @ 8:53 am

    વાહ વાહ વાહ !!

    અદ્ભૂત ગઝલ … એકેએક શેર લાજવાબ … !!

  3. ધવલ said,

    January 13, 2015 @ 9:16 am

    अर्से से दिल ने की नहीं सच बोलने की ज़िद
    हैरान हूँ मैं कैसे ये बच्चा सुधर गया

    – વાહ !

  4. SHAIKH Fahmida said,

    January 14, 2015 @ 3:03 am

  5. Mukul Jhaveri said,

    January 15, 2015 @ 3:15 am

    અફલાતઊન ગઝલ

  6. SHAIKH Fahmida said,

    January 20, 2015 @ 8:23 am

    Good one.

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