શાહીમાંથી આમ કાં ઢોળાય છે તારાં સ્મરણ ?
એને મારું એક મન ઓછું પડ્યુ ? કોને ખબર ?
રમેશ પારેખ

हुआ है – राजेश रेड्डी

अक्स आईने में आकर भी न आया हुआ है
सबने अपने में कहीं खुद को छुपाया हुआ है

जिंदगी तो कभी आई ही नहीं पर हमने
कब से जीने का ये इल्ज़ाम उठाया हुआ है

दिल के जलने की खबर दुनिया को लगने हि न दी
राख के नीचे धुँआ हमने दबाया हुआ है

कब ख़ज़ाना ये लुटाया है किसी ने ह्म पर
अपनी आँखों का हर इक मोती कमाया हुआ है

थरथराती ही रहेगी मेरी लौ बुज़ने तक
वो दिया हूँ जो हवाओं का सताया हुआ है

नाशनासाई का क्या ज़िक्र शनासाओं की [ नाशनासाई = अपरिचय , शनासा = परिचित ]
अब तो बेगाना यहाँ अपना हि साया हुआ है

खूब वाक़िफ़ है हकीक़त से तेरी सोहरत की
हमने भी थोड़ा-बहुत नाम कमाया हुआ है

रोज़ ही ताज़ा सुखन होता है नाज़िल हम पर [ नाज़िल = अवतार ]
रोज़ ही ताज़ा सितम वक़्त न ढाया हुआ है

– राजेश रेड्डी

આજે નાવીન્યને ખાતર એક હિન્દી ગઝલ…. આમ તો સરળ ગઝલ છે. છેલ્લેથી બીજો શેર જરા નબળો લાગ્યો,બાકી બધા ગમ્યા.

6 Comments »

  1. B said,

    May 11, 2014 @ 6:42 am

    I is nice to read some Hindi ghazals and poems sometimes . I appreciate it. You also made the simple explanation of some words, that also ,I am sure readers will like . Ghazal delivers a lot of messages. Keep it up.

  2. Harshad said,

    May 11, 2014 @ 9:46 pm

    Like it. Vivekbhai also like this change. Anyway it is really a good Gazal.

  3. kiran said,

    June 10, 2014 @ 9:58 am

    વાહ ક્યા બાત હૈ

  4. Jigar said,

    May 31, 2016 @ 11:25 am

    તીર્થેશભાઇ,
    મત્લામાં “આકાર ભી ન આયા” ની જગ્યાએ
    “આકર ભી ન આયા” હોવું જોઇએ.

  5. તીર્થેશ said,

    June 1, 2016 @ 3:07 am

    Corrected. Thanks.

  6. Kasim shaikh said,

    March 31, 2017 @ 2:19 pm

    Fine ,testy

RSS feed for comments on this post · TrackBack URI

Leave a Comment