ચાલ્યા જતા પ્રસંગની એકાદ ક્ષણ રહે
તો પણ પૂરા પ્રસંગનું વાતાવરણ રહે.
જવાહર બક્ષી

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Archive for દુષ્યંતકુમાર

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साये में धूप (कडी : १)- दुष्यन्त कुमार
साये में धूप (कडी : २) - दुष्यन्त कुमार
साये में धूप (कडी : ३)- दुष्यन्त कुमार
એક આશીર્વાદ - દુષ્યંતકુમાર



साये में धूप (कडी : ३)- दुष्यन्त कुमार

હિંદી સાહિત્યના ગઝલસમ્રાટ શ્રી દુષ્યન્ત કુમાર સાથે ‘લયસ્તરો’ના વાચકોનું તાદાત્મ્ય સાધતી આ ત્રીજી અને આખરી કડી છે. ફક્ત બાવન ગઝલોના આંગળીના વેઢે ગણી શકાય એટલા શેરોમાં એમણે જે કામ કર્યું છે એ કામ દીવાનના દીવાન ભરી નાંખનાર શાયરો પણ કદાચ નથી કરી શક્યા. દિલની પીડાથી વધુ એમણે ગરીબ-મજબૂર માણસના દર્દને પ્રાધાન્ય આપ્યું છે. એમની ગઝલો વાંચો અને આપણા જ દિલના કોઈક ખૂણામાં રહેલ સામાજિક અવ્યવસ્થા, અસહિષ્ણુતા અને અસમાનતા પરત્વેના વિરોધને વાચા મળતી જણાય છે. પોતાને શું કહેવું છે એ વાતથી આ શાયર બખૂબી વાકેફ છે. એ સાફ જણાવે છે કે, “मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ, वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ ।” આ ગઝલોમાં ભાષાનો આડંબર નથી, કડવી વાસ્તવિક્તાની દાહક સચ્ચાઈ છે અને એટલે જ આ ગઝલો આપણે વાંચીએ છીએ ત્યારે એ દુષ્યન્ત કુમારની ઓછી અને આપણી પોતાની વધારે લાગે છે… આજ કવિકર્મની સાર્થક્તા છે…!

(વાંચો કડી-૧ અને કડી-૨)

एक आदत सी बन गई है तू,
और आदत कभी नहीं जाती ।

दर्दे दिल वक्त को पैग़ाम भी पहुँचाएगा,
इस क़बूतर को ज़रा प्यार से पालो यारो ।
कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो ।
(सूराख=छेद)

तुम कहीं पर झील हो, मैं एक नौका हूँ,
इस तरह की कल्पना मन में उभरती है ।

सिर्फ़ शायर देखता है क़हक़हों की असलियत,
हर किसी के पास तो एसी नज़र होगी नहीं ।

चट्टानों पर खडा़ हुआ तो छाप रह गई पाँवों की,
सोचो कितना बोझ उठाकर मैं इन राहों से गुज़रा ।

मैं ठिठक गया था लेकिन तेरे साथ-साथ था मैं,
तू अगर नदी हुई तो मैं तेरी सतह रहा हूँ ।

तेरे सर पे धूप आई तो दरख़्त बन गया मैं,
तेरी ज़िन्दगी में अकसर मैं कोई वजह रहा हूँ ।
(दरख्त=पेड़)

इस अहाते के अँधेरे में धुँआ-सा भर गया,
तुमने जलती लकडियाँ शायद बुझाकर फेंक दी ।
(अहाता=बाडा़)

एक बूढा़ आदमी है मुल्क में या यों कहो-
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है ।

इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब कि सदक़े आपके,
जब से आज़ादी मिली है मुल्क में रमज़ान है ।

कल नुमाइश में मिला वो चीथडे़ पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है ।

कोई निजात के सूरत नहीं रही, न सही,
मगर निजात की कोशिश तो एक मिसाल हुई ।
(निजात=आज़ादी)

समुद्र और उठा, और उठा, और उठा,
किसी के वास्ते ये चाँदनी बबाल हुई ।

फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए,
हमको पता नहीं था कि इतना ढलान है ।

उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें,
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए ।

तू किसी रेल-सी गुज़रती है,
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ ।

एक बाजू उखड़ गया जब से,
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ ।

मैं तुझे भूलने की कोशिश में,
आज कितने करीब पाता हूँ ।

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार,
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार ।

इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं,
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फ़रार ।
(शरीके जुर्म=अपराध में सामिल)

तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीन नहीं,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं ।

-दुष्यन्त कुमार

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साये में धूप (कडी : २) – दुष्यन्त कुमार

હિંદી ગઝલની પરંપરામાં સમકાલીન સમાજનો તારસ્વર સૌપ્રથમ દુષ્યન્ત કુમારની ગઝલોમાં મુખર થતો દેખાય છે. હિંદી ગઝલ પહેલવહેલીવાર સાકી, શરાબ, સનમ, બુલબુલ- અને એ રીતે ઉર્દૂ ગઝલની અર્થચ્છાયાઓ – છોડીને આમ-આદમીના ફાટેલા કપડાં અને ભૂખ્યા પેટ સુધી આવી. સમાજના છેડાના માણસનો આર્તસ્વર એ રીતે એમની ગઝલોમાં ગવાયો છે કે આંખમાં આંસુ આવી જાય. કવિએ પોતે પોતાની ગઝલ વિશે આમ કહ્યું હતું: “जिन्दगी में कभी-कभी ऐसा दौर भी आता है जब तकलीफ गुनगुनाहट के रास्ते बाहर आना चाहती है। उस दौर में गमे जानाँ और गमे दौराँ तक एक हो जाते हैं। मैंने गजल उसी दौर में लिखी है।” ૩૦-૦૯-૧૯૩૩ના રોજ પૃથ્વીના પટ પર પ્રથમ શ્વાસ લેનાર આ શાયર માત્ર બેતાળીસ વર્ષની નાની વયે ૩૦-૧૨-૧૯૭૫ના રોજ કાયમી અલવિદા કહી ગયા પણ એમના શબ્દોમાં કંડારાયેલા આ ‘કોમન-મેન’ની વેદનાના શિલ્પ यावत् चद्रोदिवाकरौ અમર રહેશે…

* * *

अब सबसे पूछता हूँ बताओ तो कौन था,
वो बदनसीब शख़्स जो मेरी जगह जिया ।

मैं भी तो अपनी बात लिखूँ अपने हाथ से,
मेरे सफ़े पे छोड़ दे थोडा़ सा हाशिया ।
(सफ़ा=कागज़)

इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते है क्षणिक उत्तेजना है ।

दोस्तो ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में सम्भावना है ।

किसी भी क़ौम की तारीख़ के उजाले में,
तुम्हारे दिन हैं किसी रात की नक़ल लोगो ।

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए ।
(पीर=पीडा)

सिर्फ़ हंगामा खडा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए ।

वे सहारे भी नहीं अब, जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ, उन हाथों में तलवारें न देख ।

दिल को बहला ले, इजाज़त है, मगर इतना न उड़,
रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख ।

ये धुँधलका है नज़र का, तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख, दीवारों में दीवारें न देख ।
(रोजन=छेद, सुराख)

मरघट में भीड़ है या मज़ारों पे भीड़ है,
अब गुल खिला रहा है तुम्हारा निज़ाम और ।
(मरघट=समशान, मज़ार=कब्र)

घुटनों पे रख के हाथ खडे़ थे नमाज़ में,
आ-जा रहे थे लोग ज़ेहन में तमाम और ।
(ज़ेहन=समज़, दिमाग)

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता,
हम घर में भटके हैं, कैसे ठौर-ठिकाने आएँगे ।

ज़िन्दगी एक खेत है,
और साँसें जरीब है ।
(जरीब=जमीन नापने का साधन)

उफ़ नहीं की उजड़ गए,
लोग सचमुच गरीब है ।

जिन आँसुओं का सीधा तआल्लुक़ था पेट से,
उन आँसुओं के साथ तेरा नाम जुड़ गया ।

बहुत क़रीब न आओ यक़ीं नहीं होगा,
ये आरज़ू भी अगर कामयाब हो जाए ।

इस तरह टूटे हुए चेहरे नहीं हैं,
जिस तरह टूटे हुए ये आइने है ।

आपके क़ालेन देखेंगे किसी दिन,
इस समय तो पांव कीचड़ में सने हैं ।

– दुष्यन्त कुमार

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साये में धूप (कडी : १)- दुष्यन्त कुमार

હિંદી કાવ્ય-જગતમાં દુષ્યન્ત કુમાર એક એવું નામ છે જે ઉર્દૂના મહાકવિ ગાલિબની સમકક્ષ નિઃશંક માનભેર બેસી શકે છે. ખૂબ જ ટૂંકી જિંદગીમાં ખૂબ જ ઓછી ગઝલો લખી જનાર દુષ્યન્ત કુમારની ગઝલોએ જે સીમાચિહ્ન હિંદી સાહિત્યાકાશમાં સર્જ્યું છે એ न भूतो, न भविष्यति જેવું છે. એમની ગઝલોમાં જે મિજાજ, સમાજની વિષમતાઓ અને વિસંગતતાઓ સામે જે આક્રોશ અને જે મૌલિક્તા જોવા મળે છે એ એક અલગ જ ચીલો ચાતરે છે. ગઝલને હિંદીપણું બક્ષવામાં એમનો જે સિંહફાળો છે એ કદી અવગણી શકાય એમ નથી. એમના જ શબ્દોમાં જોઈએ તો, “मैं स्वीकार करता हूँ…. …कि उर्दू और हिंदी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उनमें फ़र्क कर पाना बडा़ मुश्किल होता है । मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज्यादा से ज्यादा करीब ला सकूँ । इसलिये ये गज़लें उस भाषा में कही गयी है, जिसे मैं बोलता हूँ ।” માત્ર બાવન જ ગઝલોનો રસથાળ ધરાવતો એમનો એકમાત્ર ગઝલ-સંગ્રહ “साये में धूप” આજે પણ હિંદી ભાષાની સહુથી મૂલ્યવાન અસ્ક્યામત કેમ ગણાય છે એ જાણવા માટે ચાલો, એક લટાર મારીએ એમની ગઝલોની ગલીઓમાં…

कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए ।
(मयस्सर=उपलब्ध)

न हो कमीज़ तो पाँवो से पेट ढँक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफ़र के लिए ।

वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता,
मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए ।
(मुतमइन=संतुष्ट)

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं ।

ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,
मैं सजदे में नहीं था, आप को धोखा हुआ होगा ।
(सजदा = इबादत में झुकना)

यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ,
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा ।

एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो,
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है ।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है ।

कितना अच्छा  है कि साँसों की हवा लगती है,
आग अब उनसे बुझाई नहीं जाने वाली ।

हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया,
हम पर किसी खुदा की इनायत नहीं रही ।
(इनायत=मेहरबानी)

हमको पता नहीं था हमें अब पता चला,
इस मुल्क में हमारी हुकूमत नहीं रही ।

ग़ज़ब है सच को सच कहते नहीं वो,
कुरानो-उपनिषद खोले हुए है ।

हमारा क़द सिमट कर घिंट गया है,
हमारे पाँव भी झोले हुए है ।

मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह,
ज़िन्दगी ने जब छुआ तब फ़ासला रखकर छुआ ।

खडे़ हुए थे अलावों की आँच लेने को,
सब अपनी अपनी हथेली जलाके बैठ गये ।
(अलावों=आग का ढेर)

लहू-लुहान नज़ारों का जिक्र आया तो,
शरीफ़ लोग उठे दूर जाके बैठ गये ।

वो देखते हैं तो लगता है नींव हिलती है,
मेरे बयान को बंदिश निगल न जाए कहीं ।
(बंदिश=प्रतिबंध)

चले हवा तो किवाडों को बंद कर लेना,
ये गर्म राख शरारों में ढल न जाए कहीं ।

– दुष्यन्त कुमार

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એક આશીર્વાદ – દુષ્યંતકુમાર

જા તારા સપના મોટા થાય.
લાગણીઓના ખોળામાંથી ઉતરીને
જલ્દી જમીન પર ચાલતાં શીખે.
ચાંદ-તારા જેવી અપ્રાપ્ય ઊંચાઈઓને માટે
રીસાતા જીદ કરતા શીખે.
હસે
મલકાય
ગાય.
દરેક દીવાનું તેજ જોઈને લલચાય,
પોતાની આંગળી દઝાડે.
પોતાના પગ પર ઊભા રહે.
જા તારા સપના મોટા થાય.

-દુષ્યંતકુમાર

હિન્દીના મોટા ગજાના કવિ દુષ્યંતકુમારની આ કવિતા મારી અતિપ્રિય કવિતાઓમાંથી એક છે. એ વાચકને આશીર્વાદ આપવાને બદલે સીધા સપનાઓને આશીર્વાદ આપે છે ! સપનાના મોટા થવાની ઘટના આખી જીંદગી ચાલ્યા જ કરે છે. અને ખરેખર જોઈએ તો જીંદગી સપનાના સરવાળાથી વધારે છે પણ શું ?

મૂળ કવિતા एक आशीर्वाद ‘કાવ્યાલય’ પર ઉપલબ્ધ છે.

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